झंझारपुर (मधुबनी) । झंझारपुर अनुमंडल क्षेत्र के पस्टन गांव स्थित ईसा पूर्व की अमूल्य पुरातात्विक धरोहर बौद्ध बिहार पुरातत्व विभाग की उपेक्षा के कारण नष्ट होने के कगार पर है। पुरातत्व विभाग द्वारा अधिगृहित इस बौद्ध बिहार के अब त
क न ही संरक्षण का और न ही खुदाई का प्रयास किया गया है।
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार मुसहरनीयां डीह के नाम से विख्यात यह बौद्ध बिहार ईसा पूर्व आंध्र सातवाहन काल की बतायी जाती है। 30 वर्ष पूर्व 1979 ई. तक यह ऊंचे टीले के रूप में था। ग्रामीणों द्वारा घर-आंगन में मिट्टी भरायी के लिए किये गये खुदाई के क्रम में इसमें से ढेरों पक्की हुई मिट्टी की बुद्ध मूर्ति के साथ अमरावती, शैली की चार इंच छोटी दुर्लभ बुद्ध मूर्ति मिली। इस मूर्ति की खासियत यह है इसके ऊपर मानवीय त्वचा के समान लेप चढ़ा हुआ है। इस पत्थर की मूर्ति को खरोचने पर पत्थर को देखा जा सकता है। इस विषय में वाचस्पति संग्रहालय अंधराठाढ़ी के स्थापक व पुराप्रेमी व लेखक पं. सहदेव झा ने बताया कि इस बौद्ध बिहार मूर्ति बिहार व भारत सरकार के पुरातत्व विभाग को भेजी गयी। जानकारी मिली कि टीला को पुरातत्व विभाग द्वारा सर्वेक्षण व निरीक्षण के बाद उत्खनन से पूर्व की सारी कागजी कार्रवाई पूरी कर ली गयी है। परंतु सरकार की ओर से इसके संरक्षण व उत्खनन का कार्य शुरू नहीं किया जा सका है। इस बौद्ध बिहार में 17 छोटे-छोटे कमरे बने हैं। इस टीले के अगल-बगल दो अन्य टीले भी मौजूद हैं। जिससे यहां प्राचीन समय में विकसित बौद्ध बिहार होने की जानकारी प्राप्त होती है।
मधुबनी महिला कालेज में प्राचीन इतिहास के विभागाध्यक्ष उदय नारायण तिवारी का कहना है कि पस्टन का बौद्ध बिहार बिहार ही नहीं देख के दुर्लभ बौद्ध धरोहरों में एक है। परंतु इसका संरक्षण न होने से मिथिलांचल से एक प्रमुख अवशेष के दफन हो जाने की आशंका है।
